घुग्घुस नगर परिषद में करोड़ों रू CSR फंड का काला खेल?
औद्योगिक कंपनी से मिलने वाला CSR फंड किसके झोली मे जा रहा।
गरीबों का हक या कुर्सीवालों की मेजवानी?
चंद्रपुर/घुग्घुस:
औद्योगिक नगरी घुग्घुस में इन दिनों एक ही सवाल हवा में तैर रहा है —औद्योगिक कंपनियों से नगर परिषद को मिलने वाला करोड़ों रुपये का CSR फंड आखिर जा कहाँ रहा है?
CSR यानी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी फंड का उद्देश्य साफ है — क्षेत्र के विकास, बुनियादी सुविधाओं और जरूरतमंद नागरिकों के कल्याण के लिए राशि उपलब्ध कराना। लेकिन शहर की जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां कर रही है।
विकास कागजों में, जमीनी हालात बदहाल
शहर में सड़कें जर्जर, नालियां जाम, पानी की समस्या कायम, स्ट्रीट लाइट नहीं,बाल उद्यान जर्जर, कामगारों को बरोबर वेतन नहीं, ऐसे अनेक निर्माण कार्य और स्वच्छता व्यवस्था चरमराई हुई — ऐसे में सवाल उठता है कि यदि करोड़ों का CSR फंड रहा ,तो शहर का विकास दिख क्यों नहीं दिख रहा?केवल लोकपुरूष,लोकनेता का ढोल बजाने वाले का पोल खुल रहा।जनता गरीब नेता अमीर क्यो बनते जा रहा। औद्योगिक कंपनी का धुल, धुआं खाकर गरीब बीमारी पाल रहा।वही नेता और सरकारी अधिकारी उसी धुल मिटृटी के बदलें मे लाखों, करोड़ों रुपए कि प्रापर्टी बनाकर आंसमान छुंने को देख रहे।
नागरिकों का सीधा सवाल है:
आखिर एसीसी सिमेट कंपणी, लाॅयड्स मेटल कंपनी,वेकोलि कंपनी, कोल वाशरी से यह फंड किसके लिए दिया जाता है?अंबुलेन्स, अग्निशमन,मृतक परीवहन सेवा, किसके लिये दिया है, वाहनों का उपयोग अधिकतर कौन कर रहा। ठेकेदार से कमिश्नर के लिए हाथ फैलाए कौन खडा रहेता है।
इसका उपयोग नगर परिषद में कौन अनुभवी नेता कितने वर्ष से और कैसे कर रहा है? क्या इसकी कभी निष्पक्ष जांच हुई? सच्चाई खुलकर सामने आएंगी।
औद्योगिक कंपनी मे ठेके और लाभ… किन्हें?
स्थानीय सूत्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि CSR फंड से जुड़े कामों में पारदर्शिता का अभाव है।
चर्चा यह भी है कि औद्योगिक कंपनियों के ठेके और नगर परिषद के ठेके केवल नगर परिषद से जुड़े लोगों या कुछ चुनिंदा लोकप्रतिनिधियों के करीबी, कमीशन देनेवाले चेले, अधिकारी, लोकप्रतिनिधि के तलवे चाटने वाले,चपाटों,पदाधिकारी अनुभवी व्यक्तियों को ही क्यों मिलते है। यदि ऐसा है, तो यह गंभीर सवाल खड़ा करता है —क्या विकास के नाम पर केवल “अपने लोगों” को फायदा पहुंचाया जा रहा है?
नेता का विकास या शहर का?
वर्ष से शहर के विकास का डंका बजाने वाले जनप्रतिनिधियों से अब जनता पूछ रही है —
अगर CSR फंड से इतना विकास हुआ है, तो शहर की तस्वीर अधूरी क्यों दिख रही है?
क्या औद्योगिक कंपनियां यह राशि सचमुच शहर के विकास के लिए दे रही हैं,या फिर नगर परिषद में बैठे कुछ अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों तक ही सीमित रह जा रही है?जिसका अधिक लाभ नगर परिषद मे बैठे नगराध्यक्ष, नगर सेवकों, लोकप्रतिनिधि के झोली मे साकार होगी।
जनता का फूटा गुस्सा
शहर में अब यह सवाल खुलकर उठने लगा है —
क्या चुनकर भेजे गए नगर सेवक जनता के साथ विश्वासघात कर रहे हैं?
आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।
लोगों की मांग है कि:
CSR फंड की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच हो।
अब तक प्राप्त राशि और किए गए खर्च का पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक किया जाए।
ठेके प्रक्रिया की पारदर्शी जांच हो।
दोषी पाए जाने पर संबंधितों पर कठोर कार्रवाई हो।
अब पारदर्शिता की घड़ी
CSR फंड गरीबों और शहर के विकास के लिए होता है —
न कि किसी पदाधिकारी, अधिकारी या ठेकेदार की निजी तरक्की के लिए।
यदि समय रहते स्पष्टता नहीं आई, तो घुग्घुस की जनता आंदोलन का रास्ता भी अपना सकती है।
अब नजर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर है —
क्या वे इन सवालों का जवाब देंगे,
या फिर “विकास” सिर्फ भाषणों तक ही सीमित रहेगा?