घुग्घुस (चंद्रपुर):
घुग्घुस शहर से कुछ दूरी पर स्थित विदर्भ मिनरल एंड एनर्जी प्रा. लिमिटेड के पावर प्लांट से फैल रहे प्रदूषण ने हालात गंभीर कर दिए हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कंपनी द्वारा 10 फरवरी को 24 घंटे के भीतर प्रदूषण नियंत्रित करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन 72 घंटे बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
शहर और आसपास के क्षेत्रों में धुआं, राख (फ्लाई ऐश) और जहरीली गैसों का असर साफ महसूस किया जा रहा है। हवा में घुले सूक्ष्म कण (PM 2.5), सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे तत्व सीधे लोगों के स्वास्थ्य पर प्रहार कर रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, ऐसे प्रदूषण से अस्थमा, सांस संबंधी बीमारियां, हृदय रोग और समय से पहले मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
घुग्घुस में अब आंखों में जलन, लगातार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, त्वचा एलर्जी और बच्चों-बुजुर्गों के बार-बार बीमार पड़ने की शिकायतें आम हो गई हैं। कई परिवारों का कहना है कि रात में खिड़कियां बंद रखने के बावजूद घरों के अंदर धूल और राख जमा हो रही है।
स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश और रासायनिक अपशिष्ट आसपास की जमीन और जलस्रोतों को भी दूषित कर रहे हैं। इससे पीने के पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और खेती की उत्पादकता घट रही है।
नागरिकों की प्रमुख मांगें:
प्रदूषण फैलाने वाले संयंत्रों पर सख्त कानूनी कार्रवाई
आधुनिक प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की अनिवार्यता
रियल-टाइम उत्सर्जन मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जाए।
प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना
प्रभावित क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार
स्थानीय नागरिक रविंद्र जाधव ने मांग की है कि कंपनी अपने CSR फंड से शहर में एक मल्टी-स्पेशलिस्ट अस्पताल का निर्माण करे, क्योंकि प्रदूषण के कारण रोगियों की संख्या बढ़ रही है। वहीं अकरम खान का कहना है कि कंपनी बताए कि अब तक उसने स्थानीय समाज के लिए क्या सामाजिक कार्य किए हैं और बढ़ती बीमारियों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
कंपनी के मानव संसाधन विभाग प्रमुख द्वारा 24 घंटे में प्रदूषण कम करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन 72 घंटे बाद भी सुधार न होने से लोगों में रोष बढ़ गया है। नागरिकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वे तीव्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
अब बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े विभाग इस गंभीर मुद्दे पर कब संज्ञान लेते हैं। क्योंकि विकास के नाम पर यदि लोगों का स्वास्थ्य दांव पर लगाया जाएगा, तो जनता की चुप्पी ज्यादा दिन तक नहीं टिकेगी।