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वर्धा नदी भोयगांव,भारोसा घाट मे रेत माफिया की गुंडागर्दी बेकाबू

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वर्धा नदी भोयगांव,भारोसा घाट मे रेत माफिया की गुंडागर्दी बेकाबू



शराब के नशे में पत्रकार पर जानलेवा हमला


थाना प्रभारी, तहसीलदार, आरटीओ और जिला प्रशासन कटघरे में


घुग्घुस | चंद्रपुर | विशेष रिपोर्ट
वर्धा नदी के भोयगांव–भारोसा–ठामसी रेत घाट पर फल-फूल रही अवैध रेत तस्करी अब प्रशासन के नियंत्रण से बाहर नहीं, बल्कि प्रशासन की मौन सहमति से चल रही खुली लूट का रूप ले चुकी है।
स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि अब सच उजागर करने वाले पत्रकारों पर जानलेवा हमले किए जा रहे हैं।

ताज़ा मामले में रेत माफियाओं ने शराब के नशे में धुत होकर एक पत्रकार पर हमला किया—मारपीट, गाली-गलौज की और जान से मारने की खुली धमकी दी। यह हमला किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता और कानून व्यवस्था पर सीधा वार है।

थाना प्रभारी की भूमिका संदेह के घेरे में
घटना गड़चांदूर पुलिस थाने तक तो पहुंची, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पुलिस की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए—
गंभीर धाराएं लगाने से परहेज़ क्यों?
आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?
मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश किसके इशारे पर हो रही है?

स्थानीय नागरिकों का सीधा आरोप है कि थाना प्रभारी की निष्क्रियता और ढुलमुल रवैये ने रेत माफियाओं के हौसले और बुलंद कर दिए हैं।
भारोसा बस स्टैंड: माफिया की मुखबिरी फैक्ट्री
भारोसा बस स्टैंड चौराहा अब सामान्य चौराहा नहीं रहा, बल्कि रेत माफिया का मुखबिरी और सूचना तंत्र बन चुका है।

यहीं से—
पुलिस की मूवमेंट,पत्रकारों की निगरानी,छापों और कार्रवाई की भनक पहले ही माफियाओं तक पहुंचा दी जाती है।
सब कुछ सबकी आंखों के सामने—लेकिन कार्रवाई शून्य।

तहसीलदार की गैरहाज़िरी से तस्करी को खुली छूट

सबसे गंभीर सवाल तहसीलदार पर उठ रहे हैं—
रेत घाट पर टीपी (ट्रांजिट पास) और रेत वितरण के लिए समय पर मौजूदगी क्यों नहीं?

आवास योजना की आड़ में रेत तस्करी कैसे और क्यों चल रही है?

क्या यह सिर्फ लापरवाही है, या जानबूझकर आंख मूंदना?

तहसीलदार की निष्क्रियता ने माफियाओं को खुला मैदान दे दिया है।

आरटीओ और ट्रैफिक विभाग: कार्रवाई से क्यों बच रहे?

रेत तस्करी में लगे—बिना नंबर प्लेट वाले ट्रैक्टर,मुंडा और ट्रॉली पर दर्ज न होने वाले वाहन नंबर,ओवरलोड परिवहन,ड्रिंक-एंड-ड्राइव,ये सभी खुलेआम सड़कों पर दौड़ रहे हैं,
लेकिन आरटीओ और ट्रैफिक विभाग की सख्त जांच ज़मीन पर नज़र नहीं आती।

सवाल साफ है—यह अक्षमता है या मौन संरक्षण?,अग्रिकल्चर ट्रैक्टर की आड़ में रेत तस्करी!

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने

यह भी मांग उठाई है कि—
अग्रिकल्चर (कृषि) ट्रैक्टरों की गहन जांच की जाए
जिन ट्रैक्टरों का उपयोग खेती के बजाय रेत तस्करी में हो रहा है, उन पर सख्त कार्रवाई हो।
कृषि उपयोग के नाम पर हो रही रेत की अवैध ढुलाई तुरंत रोकी जाए।

जिला प्रशासन की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल

पत्रकार पर हमला, रेत माफिया का आतंक,
पुलिस–महसूल–आरटीओ की निष्क्रियता—
इन सबके बावजूद जिला प्रशासन की चुप्पी अब खुद कटघरे में है।

क्या जिला प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?

क्या कार्रवाई सिर्फ फाइलों और कागज़ों तक सीमित है?

सख्त मांगें, आर-पार की चेतावनी

पत्रकार संगठनों और नागरिकों की स्पष्ट मांग

पत्रकार पर हमले की SIT से जांच

आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी
थाना प्रभारी, तहसीलदार और आरटीओ अधिकारियों की भूमिका की जांच।

रेत तस्करी में शामिल सभी ट्रैक्टर और वाहन तुरंत जब्त।

मुखबिरी नेटवर्क पर सीधी और कड़ी कार्रवाई
अब फैसला प्रशासन को करना है।

क्या रेत माफिया यूं ही कानून को कुचलते रहेंगे?

क्या सच दिखाने की कीमत जानलेवा हमला बन चुकी है?

अब भी अगर प्रशासन नहीं जागा,
तो यह मान लिया जाएगा कि रेत माफिया नहीं, सिस्टम ही सबसे बड़ा अपराधी है।

नज़रें अब जिला कलेक्टर और राज्य सरकार की कार्रवाई पर टिकी हैं।

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