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नागाळा में कोल डिपो का काला खेल!

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नागाळा में कोल डिपो का काला खेल!



15 वर्षों से प्रदूषण, कालाबाजारी और नियमों की खुली धज्जियां, अब सड़क पर उतरे ग्रामीण


“NA परमिशन” से शुरू हुआ खेल? 9550 वर्गमीटर जमीन को मिला था वाणिज्य उपयोग का आदेश, अब इलाके में 25 से 30 कोल डिपो पर सवाल


चंद्रपुर : घुग्घुस पुलिस थाना अंतर्गत नागाळा क्षेत्र में वैध-अवैध कोल डिपो के खिलाफ आखिरकार ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। वर्षों से कोयले की कालाबाजारी, प्रदूषण और प्रशासनिक अनदेखी से परेशान नागरिकों ने सड़क पर उतरकर रास्ता रोको और चक्का जाम आंदोलन किया। आंदोलन में बुजुर्ग, महिलाएं, किसान, युवा, छात्र-छात्राएं और छोटे बच्चों सहित सैकड़ों लोग शामिल हुए। पूरे क्षेत्र में प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की गई।

ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले करीब 15 वर्षों से नागाळा क्षेत्र में 25 से 30 वैध-अवैध कोल डिपो दिन-रात खुलेआम संचालित किए जा रहे हैं। यहां नियमों को ताक पर रखकर कोयले की खरीद-बिक्री और कालाबाजारी धड़ल्ले से जारी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर कोयले का कारोबार बिना प्रशासनिक संरक्षण के कैसे चल रहा है?

2016 में मिली थी “वाणिज्य” उपयोग की NA अनुमति

इसी बीच तहसील कार्यालय चंद्रपुर द्वारा वर्ष 2016 में जारी किया गया एक आदेश अब चर्चा का विषय बन गया है। इस आदेश के तहत मौजा नागाळा, सर्वे नंबर 55/1 की 0.95.50 हेक्टेयर यानी 9550 वर्गमीटर भूमि को “वाणिज्य” उपयोग हेतु अकृषिक (NA) अनुमति दी गई थी।

यह अनुमति तत्कालीन तहसीलदार द्वारा सतपाल झुन्नीराम जैन एवं पवन राजेंद्र सराफ को प्रदान की गई थी। आदेश में नगर रचनाकार, सार्वजनिक बांधकाम विभाग, ग्राम पंचायत, स्वास्थ्य विभाग सहित कई विभागों की “ना हरकत” का उल्लेख किया गया था। इतना ही नहीं, आदेश में “कोयला भंडारण” का जिक्र भी सामने आया है, हालांकि प्रशासन ने अलग अनुमति के बिना ऐसी गतिविधि मान्य नहीं होने की बात कही थी।

अब सवाल उठ रहे हैं कि जिस भूमि को “वाणिज्य” उपयोग की अनुमति दी गई थी, वहां आखिर वर्षों से कोयले का इतना बड़ा कारोबार कैसे फैल गया? और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

काले धुएं और कोयला धूल ने गांव की जिंदगी निगली

आंदोलन कर रहे ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कोल डिपो से उड़ने वाली काली धूल ने पूरे नागाळा गांव को प्रदूषण की चपेट में ले लिया है। पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, खेत और जलस्रोत तक इससे प्रभावित हो चुके हैं। गांव का जीवनदायी तालाब पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। पानी न पशुओं के उपयोग लायक बचा है और न ही घरेलू कामों के लिए।

ग्रामीणों का कहना है कि दमा, खांसी, आंखों में जलन, टीबी और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इलाज के लिए लोगों को दूर-दराज के अस्पतालों में भटकना पड़ रहा है। कोयले की धूल से कपास और सोयाबीन जैसी फसलें भी खराब हो रही हैं, जिससे किसानों को बाजार में उचित दाम नहीं मिल रहा।कोयले कि जाली मारने से काले धुल का गुब्बारा दुर दुर तक वातावरण को प्रदुषित कर रहा।

स्कूल के बच्चे भी बीमारियों की चपेट में

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कोल डिपो के आसपास स्थित स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी लगातार बीमार पड़ रहे हैं। वहीं किसानों के खेतों तक जाने वाले सरकारी रास्तों पर डिपो संचालकों द्वारा जबरन दीवारें खड़ी कर रास्ते बंद करने के आरोप भी लगाए गए हैं। इससे खेतों में फसल बोने, सिंचाई करने और बैलगाड़ी से आने-जाने में भारी परेशानी हो रही है।

“पैसों की ताकत से बच रहे संचालक”

आंदोलनकारियों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि महामार्ग और बिजली डीबी के समीप खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, लेकिन प्रभावशाली पहुंच और पैसों के दम पर कोल डिपो संचालकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही। ग्रामीणों ने कुछ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर भी संरक्षण देने के आरोप लगाए।

“800 लोगों की जिंदगी तबाह”

ग्रामीणों का कहना है कि नागाळा गांव की करीब 800 लोगों की आबादी कोयले की काली धूल के बीच नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। लगातार प्रदूषण, बीमारियों और प्रशासनिक अनदेखी से परेशान लोगों ने अब सीधा आंदोलन का रास्ता अपना लिया है।

15 दिन का अल्टीमेटम

नागरिकों ने जिला प्रशासन और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल को चेतावनी देते हुए मांग की है कि नागाळा गांव से सभी वैध-अवैध कोल डिपो तत्काल हटाए जाएं। अन्यथा आगामी 15 दिनों में प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण विभाग और नियमों के बाहर संचालित कोल डिपो संचालकों के खिलाफ उग्र आंदोलन छेड़ा जाएगा।

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