घुग्घुस में कोयला धुलाई के नाम पर करोड़ों का काला खेल?
धूल, मिट्टी,रेत,और मिक्स राख से जल रहे बिजलीघर, जनता भर रही महंगे बिलों की कीमत!
घुग्घुस/चंद्रपुर
क्या आप जानते हैं बीते अनेक वर्ष से महाराष्ट्र की जनता से बिजली के नाम पर खुली लूट हो रही है? क्या यह भी मानते हैं कि कोयले धुलाई की आड़ में ऐसा काला खेल चल रहा है, जिसका खामियाजा सीधे गरीब जनता,उपभोक्ताओं,किसानों और पर्यावरण को भुगतना पड़ रहा है?
यह सारे सवालों ने अब पूरे कोयला और ऊर्जा क्षेत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि कोयला धुलाई के नाम पर बिजली उत्पादन केंद्रों तक पहुंचने वाला कोयला गुणवत्ता की कसौटी पर बुरी तरह फेल है। कोयले के साथ भारी मात्रा में मिट्टी, राख, पत्थर,रेत, रासायनिक धूल और अन्य अवशेष रेल्वे वैगीन से भरकर भेजे जा रहे हैं, जिससे बिजली उत्पादन की लागत बढ़ रही है और उसका बोझ आम नागरिकों पर बिजली बिल के रूप में डाला जा रहा है।
सरकारी खजाने को चूना, जनता को झटका!
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले में सवाल किसी निजी कंपनी पर नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर उठ रहे हैं। एक सरकारी संस्था को दूसरी सरकारी संस्था कथित रूप से निकृष्ट सामग्री भेज रही है, फिर भी कार्रवाई का नामोनिशान नहीं है।
सूत्रों का दावा है कि गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें और पत्राचार होते रहे हैं। अधिकारियों को जानकारी होने के बावजूद आपूर्ति जारी है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा खेल चल रहा है?
75 प्रतिशत तक निकृष्ट कोयला, फिर भी सप्लाई जारी!
जानकारी के अनुसार वरिष्ठ तकनीकी अधिकारियों ने लिखित रूप से शिकायत दर्ज कराई कि बिजलीघरों को भेजे जा रहे कोयले में मिट्टी और रेत का अनुपात अत्यधिक है। इससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है और मशीनरी को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
इसके बावजूद यदि सप्लाई नहीं रुकती, तो सवाल केवल लापरवाही का नहीं बल्कि संभावित मिलीभगत का भी खड़ा होता है।
घर में बिजली कम, बिल ज्यादा!
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि खराब गुणवत्ता वाले कोयले से बिजली उत्पादन घटता है, जबकि मशीनों की मरम्मत और रखरखाव का खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
आखिरकार यह पूरा खर्च जनता की जेब से निकाला जाता है।
सवाल सीधा है — यदि कोयला खराब है तो बिजली बिल अच्छे कैसे हो सकते हैं?
कोयले की आड़ में ‘काला कारोबार’ ?
घुग्घुस बायपास मार्ग,म्हातारदेवी,चंद्रपुर महामार्ग,शेनगांव डैप,वाशरी,कोलडेपो और आसपास के क्षेत्रों में नागरिकों ने मिक्स कोल और कोयला धुलाई पर हेराफेरी होने का गंभीर आरोप लगाए हैं। दावा किया जा रहा है कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली काली धूल, रासायनिक पाउडर और अन्य अवशेषों को कोयले में मिलाकर वाशरी संचालक,कोयला व्यापारी,बड़े बड़े
ट्रान्सपोर्टर द्वारा बड़े पैमाने पर कोयले का काला कारोबार किया जा रहा है।वेकोलि में बल्लारपुर,वणी,चंद्रपुर कोयला खदान से निकालने वाले सुद्ध कोयले कि हेराफेरी महाजैनको में सेटींग पर सुरु है।
घुग्घुस शहर में एक नही बल्कि अनेक जगह से सफेद रेत,मिट्टी को काले डस्ट में पाणी छिड़ककर प्रशासन के नाक के नीचे खुलेआम काला किया जा रहा है।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल आर्थिक घोटाला नहीं बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के खिलाफ संगठित अपराध माना जा सकता है।
किसानों की जमीन हो रही बर्बाद?
स्थानीय किसानों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में इस धूल का भंडारण और छिड़काव किया जाता है, वहां की कृषि भूमि प्रभावित हो रही है। कई किसानों ने फसल उत्पादन में गिरावट और जमीन की उर्वरता कम होने की शिकायत की है।साथ ही महामार्ग पर उड़नेवाले काले धुल से दुर्घटना का ग्राफ बढ गया। बेकसूर लोग काले धुल के काल में समां रहे हैं।यदि वैज्ञानिक जांच में यह तथ्य सामने आते हैं, तो यह मामला सीधे पर्यावरणीय नुकसान और कृषि संकट से जुड़ जाएगा।
रात दिन सांसों में जहर घोल रही धूल?
नागरिकों का आरोप है सुबह मार्निंग वॉक और रात कि हवा में उड़ने वाले धूलकणों के कारण श्वसन रोग, अस्थमा और त्वचा,टीबी, आंख कि जलन,कैंसर संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। लोगों का कहना है कि मुनाफे के लिए आम नागरिकों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है।
करोड़ों की कमाई और चुप्पी का रहस्य
क्षेत्र में चर्चा है कि कोयला परिवहन और आपूर्ति से जुड़े कुछ प्रभावशाली कारोबारी पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक रूप से बेहद मजबूत हुए हैं। आलीशान संपत्तियां, बड़े आयोजन और बढ़ता प्रभाव कई सवाल खड़े कर रहा है।
हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि सीबीआई ,आर्थिक, जीएसटी और आयकर जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।
जनता पूछ रही है… जवाब कौन देगा?
कोयले की गुणवत्ता पर लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं? बिजलीघरों तक निकृष्ट सामग्री पहुंचाने वालों पर कार्रवाई कब होगी?
बढ़ते बिजली बिलों का असली जिम्मेदार कौन है?
किसानों की बर्बाद होती जमीन और लोगों के स्वास्थ्य का हिसाब कौन देगा?
क्या प्रभावशाली लोगों के दबाव में प्रशासन मौन है?
अब जांच या फिर एक और दबा हुआ मामला?
पूरे मामले ने चंद्रपुर से नागपुर तक राजनीतिक, प्रशासनिक और औद्योगिक हलकों में हलचल मचा दी है। जनता की मांग है कि कोयला आपूर्ति, परिवहन, वाशरी संचालन, वित्तीय लेन-देन और संबंधित विभागों की भूमिका की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कराई जाए।
क्योंकि सवाल केवल कोयले का नहीं है… सवाल जनता की जेब, किसानों की जमीन, लोगों की सेहत और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।
अब देखना यह है कि इस काले धंधे पर महाराष्ट्र प्रशासन, पर्यावरण विभाग, प्रदुषण नियंत्रण विभाग कि कार्रवाई होती है या फिर कोयले की कालिख की तरह सच भी धुएं में उड़ जाता है।